गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व 10 दिन तक चलने वाला सबसे अद्भुत पर्व है। लोग अपने-अपने मोहल्ले में भगवान श्री गणेश जी के प्रतिमा स्थापित कर पूजा पाठ करते हैं, और अंतिम दिन बड़ी धूमधाम से उनका विसर्जन करते हैं। लोग इस पर्व का काफी बेसब्री से इंतजार करते हैं। यह पर्व बड़े ही खुशियों का पर्व है। लोग अच्छे-अच्छे पकवान पकाते हैं। भगवान श्री गणेश जी के लिए भी भोग लगाने हेतु उनके मनपसंद मिठाई लड्डू से उनका भोग लगाया जाता है, और फिर वही लोगों में प्रसाद के रूप में वितरण होता है। लोग बड़े ही श्रद्धा भाव से उस प्रसाद को ग्रहण करते हैं। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है यह पर्व भाद्रपद माह के चौथे दिन से शुरू होता है। गणेश जी समृद्धि और ज्ञान के देवता हैं। इसी दिन गणेश जी का जन्म हुआ था।
श्री गणेश चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथानुसार, एक बार भगवान शिव तथा माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव से चौसड़ खेलने को कहा। शिव चौसड़ खेलने के लिए तैयार हो गए, इस खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा। भगवान शिव ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका एक पुतला बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर दी और पुतले से कहा- 'बेटा, तुम बताना कि हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता?'
खेल 3 बार खेला गया और संयोग से तीनों बार माता पार्वती ही जीत गईं। खेल समाप्त होने के बाद बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिए कहा गया, तो उस बालक ने महादेव को विजयी बताया।
यह सुनकर माता पार्वती क्रोध में बालक को लंगड़ा होने, कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। बालक ने कहा कि यह मुझसे अज्ञानतावश ऐसा हुआ है, मैंने किसी द्वेष भाव में ऐसा नहीं किया। बालक द्वारा क्षमा मांगने पर माता ने कहा- 'यहां गणेश पूजन के लिए नागकन्याएं आएंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे।' यह कहकर माता पार्वती शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गईं।
एक साल बाद उस स्थान पर नागकन्याएं आईं, तब नागकन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालूम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया। उसकी श्रद्धा से गणेश जी प्रकट हुए और मनोवांछित फल मांगने को कहा। बालक ने कहा- हे विनायक! मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वे यह देख प्रसन्न हों। इसके बाद वह बालक कैलाश पर्वत पर पहुंच गया। चौपड़ वाले दिन से माता पार्वती शिवजी से विमुख हो गई थीं अत: देवी के रुष्ट होने पर भगवान शिव ने भी बालक के बताए अनुसार 21 दिनों तक श्री गणेश का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से माता पार्वती के मन में भगवान शिव के प्रति नाराजगी खत्म हो गई।
तब यह व्रत विधि भगवान शंकर ने माता पार्वती को बताई। पार्वती मां के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जगी। माता पार्वती ने भी 21 दिन तक श्री गणेशजी का व्रत किया तथा दूर्वा, फूल और लड्डूओं से गणेशजी का पूजन-अर्चन किया। व्रत के 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं माता पार्वतीजी से मिलने आ गये। उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का यह व्रत सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला व्रत माना जाता है। इस व्रत को करने से मनुष्य के सारे कष्ट दुःख दूर हो जाते हैं। मनुष्य को समस्त सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं।
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