बुद्ध शिष्य आनंद और वैश्या की कहानी (Buddh shishya Anand aur vaishya ki kahani)

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एक समय था जब भगवान बुद्ध की शरण में दीक्षा ले रहे भिक्षुओं को कई नियमों का पालन करना पड़ता था। वे (भिक्षु) किसी के भी घर तीन दिन तक ही रुक सकते थे। यह नियम स्वयं गौतम बुद्ध ने बनाया था। इस नियम का तात्पर्य यह था कि उनकी सेवा में लगे लोगों को किसी तरह की कोई दिक्कत न पहुंचे। बुद्ध और उनके भिक्षु जब यात्राओं पर निकलते थे, तो वे रास्ते में आने वाले अक्सर गरीब घरों में ही शरण लेते थे। वे इन घरों में अधिकतम तीन दिनों तक रुकने के बाद अगली यात्रा पर निकल जाते थे। एक समय की बात है वे इसी तरह यात्रा के दौरान एक गांव पहुंचे। बुद्ध और उनके शिष्य अपने रहने के लिए जगह ढूंढ रहे थे। बुद्ध के शिष्य आनंद को एक बहुत ही खूबसूरत वेश्या ने अपने घर रहने को आमंत्रित किया। आनंद ने उसे कहा कि वह उसके घर बुद्ध के अनुमति लेकर ही रह सकता है। वैश्या युवती ने वासना भारी श्वर में कही- क्या  तुम्हें इसके लिए सचमुच अपने गुरू से अनुमति लेनी होगी? मैं जानता हूं कि वह मेरे बात मान जाएंगे लेकिन उनसे पूछना मेरा कर्तव्य बनता है। आनंद ने बुद्ध से पूछा- हे बुद्ध! इस गांव में...

श्री कृष्ण लीला

श्रीकृष्ण के लीलाएं अनगिनत है। उनके अनगिनत लीलाओं को वर्णन करना संभव नहीं है। मैं यहां पर उनके लीलाओं के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहा हूं। अगर पसंद आए तो कमेन्ट बॉक्स में अपना विचार जरूर व्यक्त करें। 

भगवान श्री कृष्ण का जन्म वासुदेव और देवकी के गर्भ से कारगार में हुआ था. वासुदेव ने श्री कृष्ण को गोकुल में यशोदा के यहां दे दिया था, जहां यशोदा ने अपने लल्ला कान्हा को बड़े ही लाड़ प्यार से पाला. भगवान श्री कृष्ण बचपन से ही नटखट थे. जितना यशोदा मैया और नंद लाला उनके नटखट अंदाज से परेशान थे, उतना ही वहां के गांव वाले भी. कृष्ण जी अपने मित्रों के साथ मिलकर गांव वालों का माखन चुरा कर खा जाते थे, जिसके बाद गांव वाले उनकी शिकायत मैया यशोदा के पास लेकर पहुंच जाते थे. इस वजह से उन्हें अपनी मैया से डांट भी खानी पड़ती थी. 

कालिया नाग वध


कालिया नाग का वध श्री कृष्ण की प्रचलित बाल लीलाओं में से एक है. एक बार श्री कृष्ण अपने मित्रों के साथ यमुना नदी के किनारे गेंद से खेल रहे थे. अचानक गेंद युमना नदी में चली गई और बाल गोपल के सारे मित्रों ने मिलकर उन्हें ही नदी से गेंद लाने को भेज दिया. बाल गोपाल भी एकदम से कदम्ब के पेड़ पर चढ़ कर यमुना में कूद गए. वहां उन्हें कालिया नाग मिला. श्री कृष्ण ने अपने भाई बलराम के साथ मिलकर जहरीले कालिया नाग का वध कर दिया




भगवान श्री कृष्ण का जहां राधा जी के साथ एक खास रिश्ता था, वहीं गांव की गोपियों से भी उनकी खूब बनती थी. कृष्ण की बंसी की धुनें राधा को खूब भाती थीं. पूरे गांव में राधा-कृष्ण की रासलीलाएं खूब चर्चित हैं. किसी भी तीज-त्योहर पर खूब नाचते-गाते दिखाई देते थे. गांव की गोपियां भी श्री कृष्ण की बांसुरी की खूब दीवानी थी. श्री कृष्ण का आकर्षित चेहरा एकदम से गोपियों को अपनी ओर आकर्षित करता था. जो कि पूरे गांव में खूब प्रचलित थी.



गोवर्धन पर्वत की कहानी से भी हर कोई परिचित है. जो कि उनकी प्रचलित लीलाओं में से एक है. दरअसल, इंद्र देव श्री कृष्ण की लीलाओं से अंजान थे और उन्होंने गुस्से में गांव में बहुत तेज बारिश कर दी. गांव वालों को बचाने के लिए श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली पर उठा लिया और सबी मथुरावासियों को उसके नीचे शरण दे दी. सात दिन तक बिना कुछ खाए श्री कृष्ण गोवर्धन पर्वत को उठाए खड़े रहे. और आठवें दिन बारिश रुकने पर गांववासियों को बाहर निकाला. कार्तिक मास में अन्नकुट की पूजा भी श्री कृष्ण ने ही आरंभ कराई थी.



देवकी और वासुदेव की विदाई के समय ही कंस को आकाशवाणी हो गई थी कि देवकी का आठवां पुत्र ही कंस का वध करेगा. इसके बाद से कंस ने कई प्रयास किए, ताकि आठवें बच्चे को धरती पर ही न आने दिया जाए. लेकिन भगवान विष्णु ने ही कंस के वध के लिए श्री कृष्ण का अवतार धारण किया था. कंस ने श्री कृष्ण को मारने के लिए कई उपाय अपनाए, लेकिन वे सभी  विफल रहा. श्री कृष्ण और बलराम के अद्भुत पराक्रम को देखकर कंस ने उन्हें एक पहलवान के हाथों मरवाना तय किया. इसके लिए कंस ने श्री कृष्ण और बलराम को पहलवान से लड़ने के लिए आमंत्रित किया. लेकिन उन्होंने उस पलवान को मार दिया और कंस का भी वध कर, वासुदेव और देवकी को कारगार से मुक्त करवाया. 



कंस के वध के बाद कृष्ण और बलराम शिक्षा के लिए अपने गुरू के आश्रम चले गए. कुछ दिन श्री कृष्ण ने द्वारका में ही बिताए. इसके बाद महाभारत का ऐतिहासिक युद्ध पांडवों और कौरवों के बीच लड़ा गया, जिसका नेतृत्व श्री कृष्ण ने किया.

                       जय श्री कृष्ण 



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